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      रामायण चौपाइयाँ क्रम अनुसार 

      1. बालकाण्ड
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      बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन कुमार।
      बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस विकार॥

      शिववर रामचन्द्र की जय।
      पवनसुत हनुमान की जय॥

      सिया राम मय सब जग जानी।
      करहुं प्रणाम जोरि जुग पानी॥

      भे प्रकट कृपाला, दिव्य, कौसल्या हितकारी।
      हर्षित महतारी, मुनि मन हारी, अद्भुत रूप निहारी॥
      2. अयोध्याकाण्ड
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      रघुकुल रीति सदा चलि आई।
      प्राण जाय पर बचन न जाय॥

      सबु नृप कहहुं सुनहु सब लोगा।
      रामु न जाइ बन अस जोगा॥
      3. अरण्यकाण्ड
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      जाके प्रिय न राम वैदेही।
      सो नर तजि कोटि बैरी सम तेही॥

      सुनु खगपति मम कथा सुहाई।
      मंगल करणी मोड़ उपजाई॥
      4. किष्किन्धाकाण्ड
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      राम नाम बिनु जगत अँधेरा।
      राम बिमुख संपति सब माया।।

      कपि सो कुल धन धाम तुम्ह, तुम्ह ते नाथ मित्र।
      तुलसी तुलसी राम के, निर्भय होहु निहाल॥
      5. सुन्दरकाण्ड
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      राम काजु कीन्हें बिनु, मोहि कहा विश्राम।
      सत्य कहूँ तोहि पाई प्रभु, कृपा सिन्धु प्रभु॥

      संकट कटै मिटै सब पीरा।
      जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥
      6. लंका कांड (युद्धकाण्ड)
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      रावण रथी विर्थ रघुबीरा।
      देखिये विचार करि मनधीरा॥

      रघुकुल रीति सदा चलि आई।
      प्राण जाय पर बचन न जाय॥

      रामराज्य स्थापित त्रैलोका।
      हर्षित भे गए सब सोका॥
      7. उत्तरकाण्ड
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      चरित बहुत भवनु हित लागा।
      राम चरित मुनिबार उर भागा॥

      सकल पदारथ एहि जग माहीं।
      करमहिं नर पावत नहीं॥