श्री रावणेश्वर बैजनाथ धाम की पावन आल्हा
(लोकगीत शैली: आल्हा — वीर रस और भक्तिरस का मिश्रण)
बोलो बम बम भोलेनाथ की,
जय हो बैजनाथ की ।
लंका नरेश रावण की,
अचल रही प्रभु साथ की ॥
चला रावण तप के राही,
वन में बैठा साधु जाही।
घोर तपस्या भुजा चढ़ाई,
ग्यारह सिरों की हो बलिहारी॥
शिव शंकर हो गए प्रसन्ना,
बोले - "वर मांगो भकता!"
रावण बोला - "भोलेनाथ,
लंका चलो बनाओ नाथ!"
शिव बोले - "देता हूं लिंग,
पर शर्त मेरी ध्यान में लिंग।
जहां रखा जाएगा भुइंया,
वहीं रह जाऊँगा मैं संगींया।"
रावण उठा शिव का वरदान,
ले चला उसे करके ध्यान।
देव माया ने ली परीक्षा,
बना ग्वाला विष्णु की लीला॥
धरती पर जब रावण छोड़ा,
लिंग हुआ स्थिर, न फिर जोड़ा।
खींचा बहुत, उठाया घूंसा,
शिव न हटे, रावण ने कूसा।
बैठा वहीं बैजनाथ प्यारा,
रावण का टूटा अभिमाना।
शिव को लंका ले ना पाया,
मगर धाम अनंत बसाया।
कहते हैं भक्त इस धाम को,
रावणेश्वर प्यारा नाम को।
झारखंड की धरती पावन,
जहां बसें शिव, रावण सावन।
कांवड़ लाते भक्त हज़ारी,
"बोल बम" गूंजे हर पग भारी।
बैजनाथ की जय जयकारा,
शिव ही सत्य, शिव ही सहारा।जय श्री रावणेश्वर!
जय बाबा बैजनाथ!
जो सुन ले आल्हा यह प्यारा,
उसका जीवन बने उजियारा।