
स्थानीय मान्यता के अनुसार:
माँ जंगली देवी मंदिर के नामकरण और इसकी स्थापना से जुड़ी एक बेहद अनूठी और चमत्कारी पौराणिक लोककथा प्रचलित है। सदियों पहले, कानपुर का यह दक्षिण भूभाग (वर्तमान किदवई नगर और बाकरगंज क्षेत्र) पूरी तरह से निर्जन और घने, डरावने जंगलों से घिरा हुआ था। इस घनघोर जंगल के बीचो-बीच एक प्राचीन तालाब और उसके किनारे एक विशाल, पुराना नीम का पेड़ हुआ करता था।
लोक कथा के अनुसार, लगभग 1400 वर्ष पूर्व इस क्षेत्र के पास बाकरगंज मोहल्ले में मोहम्मद बकर नाम के एक व्यक्ति रहते थे। जब वे अपने मकान या भूमि की खुदाई करवा रहे थे, तब ज़मीन के काफी नीचे से एक प्राचीन पत्थर की शिला (विग्रह) और एक छोटा सा रहस्यमयी ताम्रपात्र निकला। उस ताम्रपत्र पर प्राचीन लिपि (जिसका कुछ अंश उर्दू या पुरानी सांकेतिक भाषा जैसा प्रतीत होता था) में माता की महिमा और इतिहास अंकित था। खुदाई में मिली इस अनमोल धरोहर और विग्रह को शुरुआत में वहां से हटाकर दूसरी जगह ले जाने का प्रयास किया गया।
कहा जाता है कि उसी रात माता ने क्षेत्र के एक बुजुर्ग और धर्मनिष्ठ व्यक्ति को सपने में दर्शन दिए। देवी माँ ने क्रोधित स्वर में चेतावनी दी कि उस ताम्रपात्र और विग्रह को तुरंत उसी निर्जन जंगल वाले तालाब और नीम के पेड़ के पास स्थापित किया जाए। यदि ऐसा नहीं किया गया, तो पूरे क्षेत्र पर भयंकर प्राकृतिक आपदा और महाविनाश आ जाएगा। सुबह उठकर उस बुजुर्ग ने यह बात ग्रामीणों और स्थानीय रहवासियों को बताई। भय और श्रद्धा के चलते, सभी ग्रामीणों ने मिलकर उस विग्रह और ताम्रपत्र को वापस लाकर उसी घने जंगल में नीम के पेड़ की खोह (खोखले हिस्से) में सुरक्षित स्थापित कर दिया।
चूँकि यह विग्रह घने और हिंसक जानवरों से भरे जंगल के बीच स्थापित था और लोग यहाँ केवल दिन के उजाले में माता के खौफनाक क्षेत्र में आने का साहस करते थे, इसलिए धीरे-धीरे भक्तों ने देवी माँ को "माँ जंगली देवी" पुकारना शुरू कर दिया। इस प्रकार जंगल की रक्षक देवी आज लाखों लोगों की आस्था का केंद्र बन चुकी हैं।
उपलब्ध स्रोतों/मंदिर की जानकारी के अनुसार:
जंगली देवी मंदिर का ऐतिहासिक सफर केवल एक धार्मिक स्थल का नहीं, बल्कि कानपुर के शहरी विकास और प्राचीन पुरातत्व से जुड़ा हुआ है। पुरातत्वविदों और मंदिर के मुख्य पुजारियों के अनुसार, इस मंदिर का ऐतिहासिक मूल सातवीं शताब्दी (लगभग 1400 वर्ष पूर्व) का माना जाता है। भारत के मध्यकाल और नवाबों के दौर में भी इस निर्जन स्थान पर छिपे हुए साधु-संत आकर तंत्र साधना और भगवती की आराधना किया करते थे।
इतिहास में एक बड़ा मोड़ तब आया जब मोहम्मद बकर के समय खुदाई के दौरान वह ऐतिहासिक ताम्रपत्र बरामद हुआ। मंदिर की प्रामाणिकता को जांचने के लिए उस मूल ताम्रपत्र को लखनऊ पुरातत्व विभाग को सौंप दिया गया था, ताकि उसकी लिपि और समय काल की सटीक गणना की जा सके। पुरातत्व विभाग द्वारा की गई जांच में यह सिद्ध हुआ कि यह विग्रह और स्थान बेहद प्राचीन काल का है। वर्तमान में भी उस मूल ताम्रपत्र की प्रामाणिक प्रतिलिपि (बुकलेट के रूप में) मंदिर के मुख्य ट्रस्ट के पास सुरक्षित रखी हुई है, जिसमें मंदिर के सदियों पुराने इतिहास का पूरा ब्यौरा मौजूद है।
आधुनिक इतिहास की बात करें तो वर्ष 1979 तक यह स्थान एक छोटे से चबूतरे और नीम के विशाल वृक्ष के रूप में ही मौजूद था। यहाँ एक बड़ा तालाब था जहाँ लोग आने से कतराते थे। लेकिन सन 1979 में कानपुर में एक भयंकर चक्रवाती तूफान आया। उस भीषण तूफान के कारण वह सदियों पुराना नीम का पेड़ जड़ से उखड़कर गिर गया, जिसके खोह में माता की मूर्ति विराजमान थी। आश्चर्य की बात यह थी कि इतना विशाल पेड़ गिरने के बावजूद माता की पाषाण मूर्ति को खरोंच तक नहीं आई।
इस चमत्कारी घटना से प्रभावित होकर स्थानीय भक्तों और कानपुर के संभ्रांत नागरिकों ने मिलकर सन 1980 में "जंगली देवी मंदिर ट्रस्ट" की आधिकारिक स्थापना की। इसके बाद भव्य मंदिर निर्माण का कार्य शुरू हुआ। तालाब को सुरक्षित कर चारों तरफ पक्के घाट और परिसर का निर्माण किया गया। आज जिस आधुनिक और भव्य किदवई नगर इलाके को हम देखते हैं, वह कभी इसी मंदिर के चारों ओर फैला हुआ जंगल था। वर्तमान में यह मंदिर कानपुर दक्षिण के सबसे बड़े धार्मिक और सामाजिक केंद्रों में से एक बन चुका है।
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