
स्थानीय मान्यता के अनुसार:
माता सीता के कठिन तप और सखियों के साथ की पावन कथा:
तपेश्वरी देवी मंदिर की पौराणिक कथा सीधे रामायण महाकाव्य और माता सीता के जीवन के सबसे भावुक व संघर्षपूर्ण दौर से जुड़ी हुई है। हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार, लंका पर विजय प्राप्त करने के बाद जब भगवान श्री राम अयोध्या के राजा बने, तब राजधर्म और सामाजिक मर्यादाओं का पालन करने के लिए उन्हें माता सीता का परित्याग करना पड़ा था। लक्ष्मण जी ने अत्यंत दुखी मन से माता सीता को गंगा किनारे महर्षि वाल्मीकि के आश्रम के समीप छोड़ दिया था। वह क्षेत्र वर्तमान में कानपुर का 'बिठूर' कहलाता है।
जब माता सीता बिठूर के वाल्मीकि आश्रम में निवास कर रही थीं, तब वह गर्भवती थीं। उस काल में बिठूर से लगा हुआ यह पूरा क्षेत्र (जहाँ आज पटकापुर और बिरहाना रोड स्थित है) एक बेहद घना, डरावना और निर्जन जंगल हुआ करता था, जिसके समीप से माँ गंगा की कल-कल करती धारा बहती थी। अपने सतीत्व की रक्षा, होने वाली संतानों के परम कल्याण, बल और बुद्धि की प्राप्ति के लिए माता सीता प्रतिदिन इस घने जंगल के भीतर एक गुप्त और शांत स्थान पर आकर आदिमाया भगवती की घोर तपस्या, व्रत और आराधना किया करती थीं।
कथा के अनुसार, माता सीता इस निर्जन वन में अकेले नहीं आती थीं। उनके साथ तीन अन्य परम धार्मिक और तपस्विनी महिलाएं भी इस वन में आया करती थीं, जिनका नाम ग्रंथों में कमला, विमला और सरस्वती बताया गया है। इन चारों देवियों ने इस पवित्र स्थल पर बैठकर एक साथ कठोर व्रत रखे और निराहार रहकर घोर तप (तपस्या) की। माता सीता और उनकी इन तीनों सखियों द्वारा किए गए इसी महान और निष्काम 'तप' के कारण इस पावन भूमि का नाम हमेशा-कमेशा के लिए 'तपेश्वरी' पड़ गया। यहाँ प्रकट हुईं माँ दुर्गा के स्वरूप को 'माँ तपेश्वरी देवी' के नाम से पूजा जाने लगा।
माता सीता के इसी कठिन तप के शुभ प्रभाव से उन्हें लव और कुश के रूप में दो अत्यंत तेजस्वी, पराक्रमी और सुंदर पुत्र रत्न प्राप्त हुए। बिठूर और कानपुर के इस संपूर्ण क्षेत्र को माता सीता की तपोभूमि माना जाता है। मान्यता है कि माता ने अपने दोनों पुत्रों की लंबी आयु और सुरक्षा के लिए इसी तपस्थली पर आकर माँ भगवती के चरणों में मन्नत मांगी थी। यही कारण है कि आज भी यह मंदिर भक्तों, विशेषकर माताओं की हर मनोकामना पूरी करने वाला एक जाग्रत सिद्ध पीठ माना जाता है। जो भी श्रद्धालु यहाँ आकर सच्चे मन से माता के इस तपस्विनी रूप की वंदना करता है, उसके जीवन के सभी संकट पल भर में दूर हो जाते हैं।
उपलब्ध स्रोतों/मंदिर की जानकारी के अनुसार:
त्रेतायुग के संस्कारों से लेकर आधुनिक काल तक का गौरवमयी इतिहास:
कानपुर का महामाया श्री तपेश्वरी देवी मंदिर केवल अंधविश्वास या आम आस्था का केंद्र नहीं है, बल्कि यह भारत के उन गिने-चुने ऐतिहासिक और पुरातात्विक धरोहरों में से एक है जिसका स्थानीय धार्मिक परंपरा में संबंध रामायण काल (त्रेतायुग) से जोड़ा जाता है। ऐतिहासिक दृष्टि से, कानपुर और उसके आस-पास का दोआब क्षेत्र (गंगा-यमुना के बीच की भूमि) जैसे बिठूर, जाजमऊ और शिवराजपुर, प्राचीन काल से ही वैदिक संस्कृति, संतों की साधना और राजाओं की कर्मभूमि रहा है। जब देश के अन्य हिस्सों में आधुनिक बस्तियों का नामोनिशान नहीं था, तब गंगा के पावन तट पर स्थित यह क्षेत्र ऋषियों के आश्रमों और आध्यात्मिक ऊर्जा का सबसे बड़ा केंद्र था।
इस मंदिर की सबसे बड़ी ऐतिहासिक महत्ता इसके 'मुंडन और कर्णछेदन संस्कार स्थल' होने से जुड़ी है। जब माता सीता के जुड़वां पुत्रों, लव और कुश का जन्म महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में हुआ, तब सनातन धर्म के शास्त्रों के अनुसार उनके बाल्यकाल के दो सबसे महत्वपूर्ण और अनिवार्य संस्कार—मुंडन (चूड़ाकर्म) और कर्णछेदन (कान छेदने की रस्म) इसी तपेश्वरी देवी की पावन वेदी पर संपन्न किए गए थे। धार्मिक परंपराओं और स्थानीय मान्यताओं में इसका उल्लेख मिलता है कि माता सीता ने स्वयं अपने हाथों से यहाँ देवी माँ के चरणों में अपने दोनों लाडलों के बाल अर्पित किए थे और उनके कान छिदवाए थे। इसी अटूट ऐतिहासिक परंपरा का श्रद्धापूर्वक पालन करते हुए, आज हजारों वर्षों बाद भी, कानपुर मंडल और पूरे उत्तर प्रदेश के कोने-कोने से हिंदू परिवार अपने नवजात शिशुओं का पहला मुंडन संस्कार और कर्णछेदन कराने इसी मंदिर के प्रांगण में आते हैं। यहाँ बच्चों का मुंडन कराना अत्यंत कल्याणकारी माना जाता है।
समय के चक्र के साथ जब गंगा की मुख्य धारा मंदिर से थोड़ी दूर खिसक गई और मध्यकाल व ब्रिटिश काल में कानपुर एक बड़े औद्योगिक, कपड़ा और सर्राफा व्यापार के गढ़ के रूप में विकसित होने लगा, तब इस ऐतिहासिक जंगल वाले स्थान ने एक घनी व्यापारिक बस्ती का रूप ले लिया, जिसे आज हम पटकापुर और बिरहाना रोड के नाम से जानते हैं। मंदिर की ऐतिहासिकता और इसकी जाग्रत शक्ति को देखते हुए समय-समय पर स्थानीय राजाओं और बाद में कानपुर के बड़े कपड़ा व स्वर्ण व्यापारियों (सर्राफा कारोबारियों) ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया और इसे एक सुंदर मंदिर का रूप दिया। मंदिर के गर्भगृह में स्थापित चारों देवियों की पाषाण मूर्तियां इतनी प्राचीन और अलौकिक हैं कि सदियों से निरंतर हो रहे जलाभिषेक और पूजा-अर्चना के कारण उनके मूल स्वरूप की नक्काशी समय के साथ विलीन हो चुकी है, जो इनके अत्यंत प्राचीन होने का सबसे बड़ा वैज्ञानिक प्रमाण है। इतिहासकार इस मंदिर को कानपुर के सबसे पुराने जीवित धार्मिक स्मारकों में प्रमुखता से गिनते हैं। इसकी आध्यात्मिक तुलना मुंबई की मुंबा देवी और कोलकाता की काली बाड़ी से की जाती है, जिन्हें पूरे शहर की रक्षक और अधिष्ठात्री देवी माना जाता है।
Birhana Rd Near Kpm Hospital 70، 208001 Kanpur، India
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• रहस्यमयी मूर्तियाँ: मंदिर के गर्भगृह में स्थापित चार देवियों की मूर्तियों में से एक मूर्ति स्वयं माता सीता की है। लेकिन सबसे बड़ा रहस्य यह है कि आज तक कोई भी यह सटीक रूप से नहीं जान पाया कि इनमें से कौन सी मूर्ति माता सीता की है और कौन सी उनकी सखियों (कमला, विमला, सरस्वती) की! चारों मूर्तियों को एक समान भाव से ही पूजा जाता है।
• कानपुर की रक्षक: इस मंदिर को कानपुर शहर की 'अधिष्ठात्री देवी' (नगर रक्षक देवी) माना जाता है। कानपुर का कोई भी बड़ा व्यापारी अपने व्यापार की शुरुआत माता के आशीर्वाद के बिना नहीं करता।
• लव-कुश की विरासत: यहाँ नवजात बच्चों का मुंडन कराना सबसे उत्तम माना जाता है, क्योंकि माना जाता है कि इसी स्थान पर त्रेतायुग में लव और कुश का मुंडन हुआ था।
नवरात्रि उत्सव (Navratri): चैत्र और शारदीय नवरात्रि के दौरान मंदिर के कपाट तड़के सुबह 03:00 AM या 04:00 AM पर ही खुल जाते हैं और भक्तों की भारी भीड़ के कारण लगातार रात्रि 11:00 PM तक खुले रहते हैं।