
स्थानीय मान्यता के अनुसार:
श्री राधाकृष्ण मंदिर की दिव्य और प्रेरक रोचक कथा:
कानपुर के इस भव्य जे.के. मंदिर के निर्माण के पीछे एक अत्यंत सुंदर और दिव्य आध्यात्मिक लोककथा जुड़ी हुई है, जो सीधे सिंघानिया परिवार की पूजनीय माता जी से संबंधित है। जे.के. उद्योग समूह के संस्थापक लाला कमलापत सिंघानिया की धर्मपत्नी श्रीमती राम प्यारी देवी भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी की अनन्य भक्त थीं। वे एक अत्यंत धार्मिक और संस्कारी महिला थीं, जो अक्सर भगवान के दर्शन के लिए मथुरा और वृंदावन की यात्रा किया करती थीं। वृंदावन की पावन कुंज गलियों और वहाँ के भव्य मंदिरों के वातावरण से वे इतनी प्रभावित थीं कि उनका मन सदैव कृष्ण भक्ति में लीन रहता था।
माना जाता है कि एक बार जब वे वृंदावन से लौटकर कानपुर आईं, तो उनके मन में एक गहरा दुःख था कि कानपुर जैसे बड़े औद्योगिक नगर में वृंदावन जैसा कोई अत्यंत भव्य, शांत और दिव्य मंदिर नहीं है, जहाँ बैठकर लोग शांति से भगवान की भक्ति कर सकें। लोककथाओं और सिंघानिया परिवार के संस्मरणों के अनुसार, एक रात राम प्यारी देवी जी को एक अत्यंत अलौकिक स्वप्न आया। उस स्वप्न में स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें दर्शन
दिए और उन्हें आशीर्वाद दिया। भगवान ने उनसे कहा कि वे व्याकुल न हों, उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान स्वयं उनके नगर में वास करेंगे।
इस अलौकिक स्वप्न से जागने के बाद राम प्यारी देवी जी के आनंद का ठिकाना न रहा। उन्होंने तुरंत अपने पुत्र सर पदमपत सिंघानिया को अपने पास बुलाया और अपने इस दिव्य स्वप्न के बारे में बताया। उन्होंने अपने पुत्र से इच्छा व्यक्त की कि कानपुर की धरती पर एक ऐसा अनोखा और भव्य मंदिर बनाया जाए, जिसके गर्भगृह में कदम रखते ही हर भक्त को वृंदावन की पावन भूमि का साक्षात अनुभव हो। माँ की इस पवित्र इच्छा और भगवान के प्रति उनकी अगाध श्रद्धा को देखते हुए सर पदमपत सिंघानिया ने तुरंत इस मंदिर के निर्माण का संकल्प लिया।
इस प्रकार, एक माँ के पावन स्वप्न और एक पुत्र के मातृ-पितृ भक्ति के संकल्प से इस दिव्य मंदिर की नींव पड़ी। मंदिर को इस तरह से डिजाइन किया गया कि इसकी बनावट और इसके विस्तृत 17 एकड़ के हरे-भरे मैदान भक्तों को आधुनिक कोलाहल से दूर ले जाकर साक्षात द्वापर युग के वृंदावन का शांतिपूर्ण अनुभव कराते हैं। आज भी मान्यता है कि जो भी भक्त सच्चे मन से यहाँ संध्या आरती में शामिल होता है, उसे भगवान राधा-कृष्ण की असीम कृपा और मानसिक शांति प्राप्त होती है।
उपलब्ध स्रोतों/मंदिर की जानकारी के अनुसार:
जे.के. मंदिर (श्री राधाकृष्ण मंदिर) की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:
उत्तर प्रदेश के औद्योगिक इतिहास में सिंघानिया परिवार (जे.के. ऑर्गनाइजेशन) का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। 19वीं और 20वीं शताब्दी के दौरान कानपुर भारत के सबसे बड़े औद्योगिक केंद्रों में से एक बनकर उभरा, जिसे "पूर्व का मैनचेस्टर" भी कहा जाता था। इसी दौर में सिंघानिया परिवार ने सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक उत्थान के लिए कई कार्य किए। इसी सामाजिक जिम्मेदारी और धार्मिक चेतना के परिणामस्वरूप जे.के. मंदिर (श्री राधाकृष्ण मंदिर) के ऐतिहासिक निर्माण की रूपरेखा तैयार हुई।
इस मंदिर के निर्माण का इतिहास औपचारिक रूप से वर्ष 1953 से शुरू होता है। सिंघानिया परिवार ने समाज कल्याण और धार्मिक गतिविधियों को सुचारू रूप से चलाने के लिए 'जे.के. ट्रस्ट' (J.K. Trust) की स्थापना की। सर पदमपत सिंघानिया ने अपनी माता श्रीमती राम प्यारी देवी की आध्यात्मिक इच्छा को पूरा करने के लिए इस ट्रस्ट के माध्यम से एक अभूतपूर्व मंदिर बनाने की योजना बनाई। वे चाहते थे कि यह मंदिर केवल एक पारंपरिक ढांचा न हो, बल्कि भारतीय संस्कृति, प्राचीन शिल्प कौशल और आधुनिक वास्तुकला का एक कालजयी प्रतीक बने।
मंदिर का निर्माण कार्य 1950 के दशक के मध्य में शुरू हुआ। इसके निर्माण के लिए देश के सर्वश्रेष्ठ शिल्पकारों, मूर्तिकारों और वास्तुकारों को कानपुर बुलाया गया। मंदिर के निर्माण में राजस्थान के बेहतरीन सफेद संगमरमर (White Marble) का उपयोग किया गया। वास्तुकारों ने इस मंदिर को एक विशेष 'नव-शिखर' (Neo-Shikhara) शैली में डिजाइन किया, जो प्राचीन उत्तर भारतीय हिंदू मंदिर वास्तुकला और आधुनिक वेंटिलेशन तकनीकों का एक बेजोड़ संयोजन है। मंदिर के मंडप (Halls) को जानबूझकर बहुत ऊँचा बनाया गया था ताकि प्राकृतिक रोशनी और हवा का प्रवाह (Ventilation) बेहतरीन ढंग से हो सके, जो उस समय की वास्तुकला में एक क्रांतिकारी कदम था।
लगभग 5-6 वर्षों के कड़े परिश्रम, अद्वितीय नक्काशी और करोड़ों रुपये की लागत के बाद, 20 मई, 1960 को यह मंदिर पूरी तरह से बनकर तैयार हुआ। इसी दिन एक भव्य प्राण-प्रतिष्ठा समारोह का आयोजन किया गया, जिसके बाद मंदिर के कपाट आम जनता और श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए। तब से लेकर आज तक (6 दशकों से अधिक समय से), यह मंदिर कानपुर के क्षितिज (Skyline) पर गर्व से खड़ा है और शहर का सबसे बड़ा सांस्कृतिक मील का पत्थर बन चुका है।
ऐतिहासिक रूप से, इस मंदिर ने कानपुर के सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करने में बड़ी भूमिका निभाई है। यहाँ न केवल स्थानीय लोग बल्कि देश-विदेश से आने वाले पर्यटक और व्यापारी भी दर्शन के लिए आते हैं। वर्ष 2010 में इस मंदिर ने अपने गौरवशाली निर्माण के 50 वर्ष (स्वर्ण जयंती) पूरे किए थे। वर्तमान में भी इस मंदिर की पूरी देखरेख, सुरक्षा, सफाई और रखरखाव का खर्च जे.के. ट्रस्ट फंड द्वारा ही वहन किया जाता है, जिससे इसकी प्राचीन भव्यता और चमक आज भी वैसी ही बनी हुई है जैसी 1960 में थी।
Govind Nagar Road 31، 208002 Kanpur، India
Monday
5:30 am - 9:30 pm
Tuesday
5:30 am - 9:30 pm
Wednesday
5:30 am - 9:30 pm
Thursday
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Friday
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Saturday
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Sunday
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September 28, 2026 4:45 am local time
1. मंदिर परिसर के भीतर जूते-चप्पल पहनकर जाना सख्त मना है (जूता स्टैंड की सुविधा उपलब्ध है)।
2. गर्भगृह के अंदर फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी पूरी तरह प्रतिबंधित है।
3. परिसर में शांति बनाए रखें और कचरा केवल डस्टबिन में ही डालें।
4. शालीन और मर्यादित वस्त्र पहनकर ही मंदिर में प्रवेश करें।
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1. बिना खंभों का विशाल मंडप: जे.के. मंदिर के मुख्य प्रार्थना कक्ष (मंडप) की छत इतनी ऊँची और इस तरह डिजाइन की गई है कि बीच में कोई बड़ा खंभा नहीं है, जिससे भक्त बिना किसी बाधा के सीधे गर्भगृह के दर्शन कर सकते हैं
2. पांच शिखर, पांच अलग मंदिर: इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसके पांच ऊंचे शिखर हैं। बाहर से देखने पर यह एक मंदिर लगता है, लेकिन इसके अंदर पांच अलग-अलग गर्भगृह हैं जो पांच अलग-अलग देवी-देवताओं को समर्पित हैं।
3. वेदों की प्राचीन प्रति: बहुत कम लोग जानते हैं कि इस आधुनिक संगमरमर के मंदिर के भीतर सनातन धर्म के प्राचीन वेदों की एक अत्यंत दुर्लभ और प्राचीन प्रति (Copy of the Vedas) भी सुरक्षित रखी गई है, जो इसका आध्यात्मिक महत्व बढ़ाती है।
4. जन्माष्टमी का भव्य उत्सव: हर साल कृष्ण जन्माष्टमी पर यहाँ पूरे उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा उत्सव होता है। इस दिन मंदिर को लाखों लाइटों से सजाया जाता है और यहाँ करीब 2 से 3 लाख श्रद्धालु दर्शन के लिए जुटते हैं।
5. पूर्णतः ट्रस्ट संचालित: स्थापना के समय से लेकर आज तक, इस मंदिर में भक्तों से किसी भी प्रकार का कोई अनिवार्य शुल्क या प्रवेश शुल्क नहीं लिया जाता। इसका पूरा खर्च जे.के. ट्रस्ट खुद उठाता है।
मंगला आरती: सुबह 05:15 AM |
शृंगार दर्शन: सुबह 06:30 AM |
राजभोग आरती: दोपहर 11:30 AM |
संध्या आरती: शाम 07:00 PM |
शयन आरती: रात्रि 09:30 PM (त्योहारों पर समय में बदलाव संभव है)।