
स्थानीय मान्यता के अनुसार श्री गौरी शंकर मंदिर के निर्माण और इसकी महिमा से जुड़ी एक बेहद प्राचीन, अलौकिक और चमत्कारी कथा सनातन परंपरा में सदियों से प्रचलित है। स्थानीय मान्यताओं और पौराणिक इतिहास के अनुसार, आज से लगभग 800 वर्ष पहले भारत में मराठा साम्राज्य का प्रभाव चरम पर था। उसी दौर में मराठा सेना के एक अत्यंत वीर, पराक्रमी और धार्मिक प्रवृत्ति के सेनापति थे, जिनका नाम अपा गंगाधर था। एक बार एक भीषण युद्ध के दौरान वे रणभूमि में शत्रुओं से लोहा लेते हुए गंभीर रूप से घायल हो गए। उनके शरीर पर अनगिनत गहरे घाव हो चुके थे और युद्ध भूमि में उनके जीवित बचने की उम्मीद बिल्कुल न के बराबर रह गई थी। वैद्यों और उनके साथियों ने भी मान लिया था कि अब उनका प्राणांत निश्चित है।
जीवन और मृत्यु के बीच इस अत्यंत कठिन संघर्ष के क्षणों में, जब संसार का कोई सहारा काम नहीं आ रहा था, तब सेनापति अपा गंगाधर ने अपनी आँखें बंद कीं और देवाधिदेव महादेव भगवान शिव और जगत जननी माता पार्वती का अनन्य भाव से स्मरण किया। उन्होंने अपने संकटमोचक भगवान के चरणों में सच्चे मन और पूरी श्रद्धा से एक अटूट मन्नत मांगी। उन्होंने प्रार्थना की कि हे प्रभु, यदि आपकी असीम अनुकम्पा से मैं इस भीषण संकट और मृत्यु के मुख से सुरक्षित बच जाता हूँ और मुझे नया जीवन दान मिलता है, तो मैं आपके इस उपकार के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए आपके और माता गौरी के पावन मिलन के प्रतीक स्वरूप एक भव्य और सुंदर मंदिर का निर्माण करवाऊंगा।
इसके बाद भगवान शिव की असीम और चमत्कारी कृपा से एक ऐसा अभूतपूर्व कौतुक हुआ जिसने सबको हैरत में डाल दिया। मरणासन्न स्थिति में पहुँच चुके सेनापति अपा गंगाधर न केवल पूरी तरह से मृत्यु के जाल से बाहर निकल आए, बल्कि कुछ ही समय में उनके सभी घाव पूरी तरह ठीक हो गए और उनकी खोई हुई शारीरिक शक्ति भी पूरी तरह वापस लौट आई। वे पूरी तरह स्वस्थ होकर खड़े हो गए। भगवान शिव के इस साक्षात चमत्कार को देखकर उनका मस्तक श्रद्धा से झुक गया। अपनी उसी पावन प्रतिज्ञा और मन्नत को पूरा करने के लिए, उन्होंने पुरानी दिल्ली के सबसे प्रसिद्ध और ऐतिहासिक इलाके चांदनी चौक में इस दिव्य मंदिर की स्थापना करवाई।
मंदिर के मुख्य गर्भगृह में स्थापित भूरे रंग का शिवलिंग साक्षात शिव स्वरूप माना जाता है, जो अत्यंत प्राचीन और चमत्कारी है। लोक मान्यताओं के अनुसार, यहाँ आने वाले भक्त जो भी मन्नत सच्चे हृदय से मांगते हैं, गौरी-शंकर की जोड़ी उसे अवश्य पूरा करती है। इस पवित्र शिवलिंग के ठीक ऊपर एक विशाल चांदी का कलश हमेशा लटका रहता है, जिससे गंगाजल और पवित्र जल की बूंदें निरंतर, चौबीसों घंटे बिना रुके शिवलिंग पर धीरे-धीरे गिरती रहती हैं। इस अनवरत जलाभिषेक को देखना अपने आप में एक परम दिव्य, अलौकिक और मानसिक शांति प्रदान करने वाला अद्भुत अनुभव है। सदियों से चली आ रही यह पावन कथा आज भी इस मंदिर के प्रति देश-विदेश के लाखों श्रद्धालुओं की अटूट आस्था को निरंतर मजबूत कर रही है। आज भी महाशिवरात्रि और सावन के पावन महीनों में दूर-दूर से श्रद्धालु इस ऐतिहासिक और पौराणिक स्थल पर आकर महादेव का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं और अपनी मनोकामनाएं पूरी होने पर श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं।
उपलब्ध स्रोतों/मंदिर की जानकारी के अनुसार श्री गौरी शंकर मंदिर का ऐतिहासिक दृष्टिकोण और इसकी पृष्ठभूमि भारतीय संस्कृति, राजनीति और धार्मिक उतार-चढ़ाव के इतिहास में अत्यंत गौरवशाली, महत्वपूर्ण और प्राचीन स्थान रखती है। यह पावन मंदिर राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के सबसे पुराने, विख्यात और ऐतिहासिक धार्मिक धरोहरों में से एक माना जाता है। यदि हम इसके इतिहास की गहराई में जाएँ, तो पता चलता है कि इस धार्मिक स्थल का इतिहास लगभग आठ शताब्दियों (800 वर्ष) से भी अधिक पुराना है। हालांकि, मंदिर की मुख्य संरचना का निर्माण और इसका व्यवस्थित जीर्णोद्धार मुख्य रूप से 18वीं शताब्दी के मध्य में, यानी लगभग सन् 1761 ईस्वी के आसपास मराठा साम्राज्य के प्रसिद्ध सेनापति अपा गंगाधर द्वारा कराया गया था। यह वह दौर था जब दिल्ली और उसके आसपास के क्षेत्रों में मराठों का राजनीतिक और सैन्य प्रभाव अत्यंत मजबूत स्थिति में था।
मुगल काल के उतार-चढ़ाव और बाद में आए ब्रिटिश शासन के अत्यंत कठिन और दमनकारी कालक्रम के दौरान भी इस मंदिर ने अपनी विशिष्ट धार्मिक पहचान, पवित्रता और सांस्कृतिक अस्तित्व को पूरी तरह से अक्षुण्ण रखा। इतिहास के पन्नों को पलटने पर यह स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है कि पुरानी दिल्ली के सबसे व्यस्त, घने और हलचल भरे व्यापारिक बाजार 'चांदनी चौक' के मुख्य मार्ग पर स्थित होने के कारण, यह मंदिर हमेशा से ही आम जनमानस की आस्था और हिंदू संस्कृति का एक अत्यंत सुदृढ़ केंद्र बनकर उभरा।
जैसे-जैसे समय बीतता गया, इस ऐतिहासिक मंदिर की संरचना में कई महत्वपूर्ण बदलाव और जीर्णोद्धार के कार्य किए गए। आधुनिक दौर में इस मंदिर को नया और भव्य स्वरूप देने में भारत के प्रसिद्ध उद्योगपति और दानी व्यक्तित्व सेठ जयपुरी का बहुत बड़ा योगदान रहा है। वर्ष 1959 में सेठ जयपुरी के विशेष सहयोग और देखरेख में मंदिर की मुख्य प्राचीन इमारत, इसके विशाल शिखरों और पूरे परिसर का व्यापक स्तर पर पुनर्निर्माण और सौंदर्यीकरण कराया गया। इसी पुनर्निर्माण के बाद मंदिर को वह वर्तमान आधुनिक, कलात्मक और भव्य रूप प्राप्त हुआ जिसे हम आज देखते हैं।
श्री गौरी शंकर मंदिर की ऐतिहासिकता और इसकी प्रासंगिकता इस बात से भी पूरी दुनिया में प्रमाणित होती है कि यह पुरानी दिल्ली की पारंपरिक 'गंगा-जमुनी तहजीब' और सर्वधर्म समभाव का एक बेहद खूबसूरत और अटूट हिस्सा रहा है। यह पूरी दुनिया में वास्तुकला और सामाजिक सौहार्द का अनूठा उदाहरण है कि चांदनी चौक की एक ही मुख्य सड़क पर कुछ ही मीटर के फासले के भीतर दिगंबर जैन लाल मंदिर, श्री गौरी शंकर मंदिर, सिख धर्म का पवित्र गुरुद्वारा सीस गंज साहिब और ऐतिहासिक सुनहरी मस्जिद एक साथ पूरी शान से खड़े हैं। यह दृश्य भारत की धार्मिक सहिष्णुता, आपसी भाईचारे और गौरवशाली इतिहास की एक ऐसी अनूठी मिसाल है जो दुनिया में कहीं और देखने को नहीं मिलती।
सदियों की राजनीतिक उथल-पुथल, सत्ता के बड़े-बड़े बदलावों, विदेशी आक्रमणों और आधुनिकता के तीव्र दौर से गुजरने के बाद भी यह मंदिर अपनी प्राचीन आध्यात्मिक ऊर्जा, सात्विकता और पौराणिक वैभव को अपने भीतर समेटे हुए अडिग खड़ा है। वर्तमान समय में इस मंदिर का प्रबंधन एक प्रतिष्ठित ट्रस्ट द्वारा बेहद कुशलता से संभाला जाता है। आज यह न केवल दिल्ली बल्कि संपूर्ण उत्तर भारत के सबसे महत्वपूर्ण और पूजनीय शिव मंदिरों में शीर्ष स्थान पर गिना जाता है, जहाँ प्रतिवर्ष महाशिवरात्रि, सावन के पवित्र सोमवार और अन्य प्रमुख हिंदू त्योहारों के अवसर पर लाखों की संख्या में श्रद्धालु इतिहास और अटूट आस्था के इस भव्य संगम का दर्शन करने और अपने जीवन को धन्य बनाने आते हैं
Choudhary 18، 110006 New Delhi، India
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September 28, 2026 4:45 am local time
1. मंदिर के मुख्य गर्भगृह के भीतर फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी सख्त वर्जित है।
2. सभी भक्तों को शालीन और पारंपरिक पोशाक पहनने की सलाह दी जाती है।
3. सावन सोमवार और महाशिवरात्रि के दिन भारी भीड़ के कारण कतारबद्ध होकर दर्शन करें।
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1. इस मंदिर के गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग लगभग 800 वर्ष पुराना और प्राकृतिक रूप से निर्मित (स्वयंभू) है।
2. शिवलिंग के ठीक ऊपर एक चांदी का पात्र लटका है, जिससे बिना रुके 24 घंटे जल की बूंदें टपकती रहती हैं।
3. यह मंदिर सांप्रदायिक सौहार्द की अनूठी मिसाल है; इसके ठीक बगल में जैन मंदिर, सामने लाल किला, और कुछ ही दूरी पर गुरुद्वारा सीस गंज व मस्जिद स्थित है।
4. वर्ष 1959 में प्रसिद्ध उद्योगपति सेठ जयपुरी द्वारा इस मंदिर का भव्य पुनरुद्धार करवाया गया था।
प्रातः आरती: सुबह 06:00 बजे
भोग एवं श्रृंगार झांकी: दोपहर के पूर्व
संध्या आरती व श्रृंगार दर्शन: शाम 07:00 बजे