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श्री जगन्नाथ मंदिर, पुरी

ग्रैंड रोड (बड़ा डांडा), पुरी शहर

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Category

  • मंदिर

मंदिर से जुड़ी रोचक कथा

स्थानीय मान्यता के अनुसार:

राजा इंद्रद्युम्न और भगवान जगन्नाथ के प्राकट्य की कथा:

पौराणिक कथाओं के अनुसार, सतयुग में मालवा के परम विष्णु भक्त राजा इंद्रद्युम्न हुए। उन्हें पता चला कि नीलपर्वत पर 'नीलमाधव' के रूप में भगवान विष्णु साक्षात निवास करते हैं, जिनकी पूजा गुप्त रूप से शबर कबीले के मुखिया बिस्वावसु करते थे। राजा इंद्रद्युम्न ने नीलमाधव की खोज के लिए अपने पुरोहित के भाई विद्यापति को भेजा। विद्यापति ने चतुराई से बिस्वावसु की पुत्री से विवाह कर लिया और अंततः अंधेरी गुफा में छिपे नीलमाधव के दर्शन कर लिए। जब राजा इंद्रद्युम्न वहां पहुंचे, तो भगवान नीलमाधव अंतर्ध्यान हो चुके थे। राजा अत्यंत दुखी हुए। तब आकाशवाणी हुई कि भगवान इस रूप में नहीं, बल्कि दारु (नीम की पवित्र लकड़ी) के विग्रह के रूप में प्रकट होंगे।

राजा को समुद्र तट पर एक विशाल तैरता हुआ नीम का लट्ठा (दारु) मिला, जिस पर शंख, चक्र, गदा और पद्म के चिह्न बने थे। राजा ने उस लकड़ी से मूर्तियां बनाने के लिए राज्य के सर्वश्रेष्ठ मूर्तिकारों को बुलाया, लेकिन कोई भी छेनी उस दिव्य लकड़ी पर नहीं चल पा रही थी, औजार टूट जा रहे थे। तब स्वयं देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा एक वृद्ध मूर्तिकार का रूप धारण कर प्रकट हुए। उन्होंने राजा के सामने एक शर्त रखी कि वे मूर्तियों का निर्माण एक बंद कमरे में करेंगे और 21 दिनों तक कोई भी उस कमरे का द्वार नहीं खोलेगा। यदि कोई बीच में कमरा खोलेगा, तो वे काम अधूरा छोड़कर चले जाएंगे। राजा ने शर्त मान ली।

कमरे के अंदर से लकड़ी तराशने की आवाजें आने लगीं। लेकिन 14-15 दिनों के बाद अचानक कमरे से आवाज आनी बंद हो गई। राजा की रानी गुंडिचा को चिंता हुई कि कहीं वृद्ध मूर्तिकार भूख-प्यास से मर तो नहीं गया। रानी के आग्रह पर राजा ने मर्यादा और शर्त को भूलकर कमरे का दरवाजा खोल दिया। दरवाजा खुलते ही वृद्ध मूर्तिकार (विश्वकर्मा जी) अंतर्ध्यान हो चुके थे और कमरे में तीन अधूरी मूर्तियां मिलीं, जिनके हाथ-पैर नहीं बने थे और आँखें बड़ी-बड़ी थीं।

राजा अपनी इस भूल पर गहरे पश्चाताप और ग्लानि से भर गए। वे रोने लगे कि अब इन अधूरी मूर्तियों की पूजा कैसे होगी। तब भगवान विष्णु ने राजा को स्वप्न में दर्शन दिए और कहा, "हे राजन! दुखी मत हो। यह मेरी ही इच्छा थी। मैं इसी निराकार और अनूठे रूप में संसार के कल्याण के लिए यहाँ स्थापित होना चाहता हूँ। बिना हाथ के भी मैं भक्तों से उनका चढ़ावा स्वीकार करूँगा और बिना पैरों के भी पूरे ब्रह्मांड का चक्कर लगाऊँगा।" इसके बाद राजा इंद्रद्युम्न ने एक विशाल मंदिर का निर्माण करवाया और उन तीनों विग्रहों (जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा) को स्थापित किया। यही कारण है कि आज भी भगवान जगन्नाथ के विग्रह उसी प्राचीन और अधूरे दिखने वाले स्वरूप में पूजे जाते हैं, जो यह सिखाता है कि ईश्वर को किसी भौतिक आकार की सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता।

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ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

उपलब्ध स्रोतों/मंदिर की जानकारी के अनुसार:

श्री मंदिर का गौरवशाली इतिहास और आक्रमणों का सामना:

उपलब्ध स्रोतों/मंदिर की जानकारी के अनुसार पुरी के वर्तमान जगन्नाथ मंदिर का ऐतिहासिक ताना-बाना बेहद समृद्ध और संघर्षपूर्ण रहा है। ऐतिहासिक दस्तावेजों और 'मादला पांजी' (मंदिर के प्राचीन आधिकारिक रिकॉर्ड) के अनुसार, इस स्थान पर प्राचीन काल से ही मंदिर अस्तित्व में था, जिसका जीर्णोद्धार 12वीं शताब्दी में कलिंग राजवंश के प्रतापी राजा अनंतवर्मन चोडगंगदेव द्वारा शुरू किया गया था। चोडगंगदेव ने गंगा राजवंश की शक्ति को स्थापित करने के बाद इस विशाल मंदिर की आधारशिला रखी थी। उनके पोते और सूर्यवंशी प्रतापी शासक राजा अनंगभीमदेव तृतीय ने लगभग 1230 ईस्वी में इस भव्य मंदिर का निर्माण कार्य पूर्ण कराया और भगवान जगन्नाथ को ओडिशा का राष्ट्र-देवता घोषित कर अपना पूरा साम्राज्य भगवान को समर्पित कर दिया, जिसके बाद राजा स्वयं को भगवान का 'राउत' (सेवक) कहने लगे।

मध्यकाल में, मंदिर अपनी अगाध संपत्ति, सोने-चांदी के भंडारों और सर्वोच्च धार्मिक प्रतिष्ठा के कारण विदेशी मुस्लिम आक्रमणकारियों के निशाने पर रहा। इतिहास गवाह है कि पुरी के इस पवित्र मंदिर पर 17 बार हमले और लूटपाट की कोशिश की गई, लेकिन हर बार मंदिर के पुजारियों, स्थानीय सैनिकों और राजाओं ने अपने प्राणों की आहुति देकर भगवान के विग्रहों की रक्षा की।

पहला बड़ा आक्रमण 1360 ईस्वी में दिल्ली के सुल्तान फिरोज शाह तुगलक ने किया था। जब भी कोई आक्रमणकारी मंदिर की ओर बढ़ता, चतुर पुजारी भगवान की मूर्तियों को मुख्य गर्भगृह से हटाकर गुप्त रास्तों से चिल्का झील के द्वीपों, गुफाओं या घने जंगलों में छिपा देते थे। आक्रमणकारी केवल खाली मंदिर को लूट पाते थे या मूर्तियों को नुकसान पहुँचाने की कोशिश करते थे। सन् 1568 में बंगाल के सुल्तान के सेनापति कालापहाड़ ने मंदिर पर सबसे भीषण हमला किया। उसने मंदिर की मूर्तियों को चुराकर हुगली नदी के किनारे जलाने का प्रयास किया, लेकिन कहा जाता है कि विग्रह के भीतर मौजूद 'ब्रह्म पदार्थ' (भगवान का हृदय) अक्षुण्ण रहा, जिसे एक भक्त ने फिर से छुपा लिया।

17वीं शताब्दी में जब मुगल शासक औरंगजेब ने मंदिर को पूरी तरह से ध्वस्त करने का आदेश दिया, तो पुरी के तत्कालीन गजपति राजाओं ने बुद्धिमत्ता और सैन्य रणनीति से मंदिर के मुख्य द्वारों को बंद कर एक झूठी दीवार खड़ी कर दी ताकि औरंगजेब की सेना को लगे कि मंदिर नष्ट हो चुका है।

इन लगातार आक्रमणों के बावजूद, मराठा साम्राज्य के उत्थान के समय मंदिर को फिर से नई सुरक्षा और संरक्षण मिला। मराठा शासकों ने मंदिर के रखरखाव के लिए भारी दान दिया और इसकी सुरक्षा पुख्ता की। इसके बाद 1803 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने ओडिशा पर कब्जा कर लिया। अंग्रेजों ने भी भारतीय जनता की अगाध आस्था को देखते हुए मंदिर के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं किया और इसके प्रबंधन का अधिकार पुरी के गजपति महाराजा को ही सौंपे रखा। वर्ष 1955 में भारत सरकार द्वारा 'श्री जगन्नाथ मंदिर अधिनियम' (Shri Jagannath Temple Act, 1955) पारित किया गया, जिसके तहत वर्तमान में मंदिर का प्रशासनिक कार्य और संचालन कानूनी रूप से एक उच्च स्तरीय समिति द्वारा किया जाता है। श्री जगन्नाथ मंदिर केवल पत्थरों की इमारत नहीं, बल्कि भारत की सनातन संस्कृति के हज़ारों साल के अटूट संघर्ष, पुनरुत्थान और विजय का सबसे बड़ा ऐतिहासिक प्रतीक है। |

मंदिर / गुरुद्वारा से जुड़ी जानकारी

  • Profile ID
    4199
  • समर्पित
    भगवान कृष्ण
  • स्थापना काल
    प्राचीन
  • वास्तुकला शैली
    कलिंग वास्तुकला शैली - रेखा देउल
  • मंदिर/ गुरुद्वारा प्रबंधन
    श्री जगन्नाथ मंदिर प्रबंधन समिति • अध्यक्ष: पुरी के गजपति महाराजा • उपाध्यक्ष: जिला कलेक्टर, पुरी
  • संस्थापक
    कलिंग राजा अनंतवर्मन चोडगंगदेव और इसे पूर्ण राजा अनंगभीमदेव तृतीय ने करवाया।
  • स्थापना वर्ष
    12वीं शताब्दी
  • क्षेत्रफल
    लगभग 37,000 वर्ग मीटर से अधिक (4,00,000 वर्ग फुट),

पता

  • मंदिर / गुरुद्वारा स्थल
    ग्रैंड रोड (बड़ा डांडा), पुरी शहर
  • जिला
    Puri
  • राज्य
    ओडिशा
  • पिन कोड
    752001
  • फोन नंबर
    06752-222001, 91-06752-223
  • ईमेल
    jagannath@ori.nic.in

Location

  • Grand Road ، 752001 Puri، India

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Opens in 15 minutes

Open hours today: 5:00 am - 11:00 pm Toggle weekly schedule
  • Monday

    5:00 am - 11:00 pm

  • Tuesday

    5:00 am - 11:00 pm

  • Wednesday

    5:00 am - 11:00 pm

  • Thursday

    5:00 am - 11:00 pm

  • Friday

    5:00 am - 11:00 pm

  • Saturday

    5:00 am - 11:00 pm

  • Sunday

    5:00 am - 11:00 pm

  • September 28, 2026 4:45 am local time

दर्शन दिशा निर्देश

• केवल रूढ़िवादी हिंदुओं को ही मुख्य परिसर में प्रवेश की अनुमति है। [1]
* वेशभूषा (Dress Code): पारंपरिक और शालीन कपड़े अनिवार्य हैं। पुरुष धोती-कुर्ता और महिलाएं साड़ी या सलवार-कमीज पहनें। शॉर्ट्स, कटी-फटी जींस, मिनीस्कर्ट, स्लीवलेस टी-शर्ट पूरी रूप से प्रतिबंधित हैं।
• चमड़े की वस्तुएं (बेल्ट, पर्स), मोबाइल, कैमरा और जूते-चप्पल मंदिर के बाहर बने क्लॉक रूम/लॉकर में जमा कराने होते हैं।

आरती / पाठ का समय

  • प्रातः आरती / पाठ का समय
    सुबह 06:00 AM
  • संध्या आरती / पाठ का समय
    शाम 07:00 PM

Author

Author avatar
komal singh

प्रकाशित

  • प्रकाशन की तिथि
    July 18, 2026

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आपके विचार

    स्थापित प्रतिमाएँ

    • भगवान कृष्ण

    प्रकृति

    • बरगद वृक्ष

    क्या आप जानते हैं?

     वे अद्भुत रहस्य जो वैज्ञानिकों को भी हैरान करते हैं:

    1. हवा के विपरीत लहराता ध्वज: मंदिर के शिखर पर लगा लाल ध्वज हमेशा हवा की विपरीत दिशा में लहराता है, जो भौतिकी के नियमों को चुनौती देता है।

    2. कोई परछाई नहीं बनती: विज्ञान के अनुसार हर वस्तु की परछाई बनती है, लेकिन इस भव्य मंदिर के मुख्य गुंबद की परछाई दिन के किसी भी समय जमीन पर दिखाई नहीं देती।

    3. रोज बदला जाता है ध्वज: मंदिर का ध्वज प्रतिदिन एक पुजारी द्वारा 45 मंजिला ऊंची इमारत जितनी ऊंचाई पर बिना किसी सुरक्षा उपकरण के चढ़कर बदला जाता है। यह परंपरा 1800 वर्षों से निर्बाध जारी है।

    4. रहस्यमयी रसोई और महाप्रसाद: मंदिर की रसोई में भगवान का महाप्रसाद पकाने के लिए मिट्टी के 7 बर्तनों को एक के ऊपर एक करके रखा जाता है। अचरज की बात यह है कि सबसे ऊपर रखे बर्तन का खाना सबसे पहले पकता है, और नीचे वाले बर्तन का सबसे बाद में।

    5. समुद्र की ध्वनि का गायब होना: मंदिर के प्रवेश द्वार 'सिंहद्वार' के अंदर जैसे ही आप पहला कदम रखते हैं, बाहर आ रही समुद्र की लहरों की आवाज पूरी तरह गायब हो जाती है। जैसे ही आप द्वार से बाहर कदम रखेंगे, आवाज फिर से आने लगती है।

    6. अन्न कभी व्यर्थ नहीं जाता: यहाँ हर दिन लाखों लोग प्रसाद ग्रहण करते हैं, लेकिन मंदिर का महाप्रसाद न तो कभी कम पड़ता है और न ही कभी एक दाना व्यर्थ बचता है।

    प्रमुख सुविधाएँ

    • Flower Shop
    • Restroom
    • Wheelchair
    • दान पात्र
    • ध्यान केन्द्र (Meditation Point)
    • पेय जल
    • प्रसाद काउंटर
    • बैठने की सुविधा

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    1. मंगला आरती (Mangala Alati): सुबह 05:00 AM से 06:00 AM
    2. मैलम (Mailam): सुबह 06:00 AM
    3. अवकाश पुरुषोत्तम (Abhakasa): सुबह 06:30 AM
    4. गोपाल वल्लभ भोग (Gopala Vallabha Bhoga): सुबह 09:00 AM
    5. सकाला धूप (Sakala Dhupa): सुबह 10:00 AM
    6. मध्याह्न धूप (Madhyahna Dhupa): दोपहर 01:00 PM से 01:30 PM
    7. संध्या धूप (Sandhya Dhupa): शाम 07:00 PM से 08:00 PM
    8. बड़ा सिंगार भोग (Bada Sringara & Pahuda): रात्रि 10:30 PM से 11:00 PM (शयन आरती)।

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