
स्थानीय मान्यता के अनुसार:
श्री गोविंद देव जी मंदिर के विग्रह के प्राकट्य और निर्माण को लेकर सनातन धर्म में बेहद अलौकिक और विहंगम लोककथाएं प्रचलित हैं। सबसे प्रमुख कथा द्वापर युग के अंत और कलयुग के प्रारंभ से जुड़ी है।
साक्षात कृष्ण का मुखारविंद:
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान श्री कृष्ण अपनी लीलाएं समाप्त कर गोलोक धाम लौट गए, तो उनके वियोग में पूरा ब्रज मंडल व्याकुल हो उठा। श्री कृष्ण के प्रपौत्र (पोते के बेटे) महाराजा वज्रनाभ मथुरा के राजा बने। उनकी दादी ने भगवान श्री कृष्ण को साक्षात देखा था। वज्रनाभ के मन में अपने परदादा श्री कृष्ण के रूप को पुनः सजीव करने की तीव्र इच्छा जागृत हुई। उन्होंने अपनी दादी के बताए शारीरिक विवरण और रूप-रंग के आधार पर ब्रज की पवित्र मिट्टी और पत्थरों से तीन अलग-अलग विग्रहों का निर्माण करवाया।
जब पहला विग्रह बना, तो दादी ने उसे देखकर कहा कि इसके चरण बिल्कुल श्री कृष्ण जैसे हैं। इस विग्रह को 'श्री मदन मोहन जी' कहा गया। जब दूसरा विग्रह बनकर तैयार हुआ, तो दादी ने कहा कि इसका वक्षस्थल और हृदय हुबहू ठाकुर जी जैसा है। इसे 'श्री गोपीनाथ जी' नाम दिया गया। अंत में, जब तीसरा विग्रह बनकर सामने आया, तो वयोवृद्ध दादी उसे देखते ही भाव-विभोर हो गईं। उनकी आंखों से आंसुओं की धारा बह निकली और उन्होंने कहा, "हाँ! यही मेरे गोविंद हैं। इनका मुखारविंद (चेहरा) हुबहू साक्षात श्री कृष्ण जैसा ही है।" इसी दिव्य विग्रह को 'श्री गोविंद देव जी' कहा गया।
गोमा टीला की चमत्कारी घटना:
समय के साथ ये विग्रह धरती के गर्भ में लुप्त हो गए। 16वीं शताब्दी में चैतन्य महाप्रभु के परम शिष्य श्रीमद रूप गोस्वामी वृंदावन में गोविंद देव जी के विग्रह को खोजने के लिए व्याकुल थे। एक दिन एक अज्ञात चरवाहा (माना जाता है कि स्वयं श्री कृष्ण वेश बदलकर आए थे) उनके पास आया और उसने वृंदावन के 'गोमा टीला' नामक स्थान की ओर इशारा किया। चरवाहे ने बताया कि यहाँ हर रोज एक गाय आकर अपने स्तनों से स्वतः दूध की धारा गिराती है। रूप गोस्वामी ने जब उस स्थान पर खुदाई करवाई, तो धरती की गोद से वही दिव्य 'गोविंद देव जी' का विग्रह प्रकट हुआ, जिसे देखकर पूरा ब्रजधाम 'जय कन्हैया लाल की' के जयकारों से गूंज उठा।
उपलब्ध स्रोतों/मंदिर की जानकारी के अनुसार:
श्री गोविंद देव जी मंदिर का इतिहास सनातन धर्म की रक्षा, मुगलों के क्रूर आक्रमणों और जयपुर के कछवाहा राजवंश की अनन्य भक्ति की एक ऐतिहासिक महागाथा है। यह इतिहास वृंदावन की पवित्र भूमि से शुरू होकर गुलाबी नगरी जयपुर के हृदय स्थल तक पहुंचता है।
वृंदावन का वैभव और मुगल संकट:
गोमा टीला से विग्रह प्रकट होने के बाद, आमेर के राजा मानसिंह प्रथम (जो मुगल सम्राट अकबर के नवरत्नों और प्रधान सेनापतियों में से एक थे) ने वर्ष 1590 में वृंदावन में लाल बलुआ पत्थर से एक सात मंजिला भव्य और गगनचुंबी मंदिर बनवाया। स्थापत्य कला का यह बेजोड़ नमूना उस समय पूरे उत्तर भारत में अपनी भव्यता के लिए प्रसिद्ध था।
लेकिन, 17वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में इतिहास ने क्रूर करवट ली। दिल्ली के सिंहासन पर कट्टर मुगल शासक औरंगज़ेब बैठा। उसने हिंदू धर्मस्थलों को नष्ट करने का फरमान जारी कर दिया। जब औरंगज़ेब की सेना ने वृंदावन के भव्य मंदिरों को तोड़ने के लिए कूच किया, तो गोविंद देव जी के मुख्य पुजारियों (गोस्वामी परिवार) को इसकी भनक लग गई। उन्होंने विग्रह को औरंगज़ेब के सैनिकों के हाथों से बचाने के लिए रातों-रात एक रथ में छिपाया और वृंदावन से निकल पड़े।
राजस्थान की गुप्त यात्रा:
मुगल सेना की नजरों से बचते हुए पुजारी विग्रह को लेकर राजपूताना के जंगलों और पहाड़ियों में कई वर्षों तक गुप्त स्थानों पर घूमते रहे। यह विग्रह कुछ समय के लिए राधाकुंड, कामां (भरतपुर), गोविंदगढ़ और फिर आमेर के पास गोविंदपुरा में सुरक्षित रखा गया। कछवाहा राजवंश ने हमेशा मुगलों से लोहा लेते हुए भी अपने इन आराध्य देव की सुरक्षा सुनिश्चित की और उन्हें राजकीय संरक्षण दिया।
जयपुर की स्थापना और गोविंद देव जी का साम्राज्य:
जब महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने वर्ष 1727 में एक आधुनिक, योजनाबद्ध और वास्तुशास्त्र पर आधारित नए शहर 'जयपुर' की नींव रखी, तो उन्होंने अपने आराध्य गोविंद देव जी को इस शहर के केंद्र में स्थापित करने का संकल्प लिया। महाराजा ने अपने स्वयं के रहने के लिए 'सिटी पैलेस' का निर्माण करवाया था और उसके ठीक सामने जय निवास उद्यान में एक सुंदर महल 'सूरज महल' बनवाया था। जय सिंह जी ने निर्णय लिया कि इस महल में वे स्वयं नहीं रहेंगे, बल्कि उनके राजा गोविंद देव जी रहेंगे।
वर्ष 1735 में पूरे राजकीय सम्मान और वैदिक मंत्रोच्चार के साथ ठाकुर जी को सूरज महल के मुख्य गर्भगृह में प्रतिष्ठित किया गया। महाराजा सवाई जय सिंह ने स्वयं को गोविंद देव जी का 'दीवान' (प्रधान सेवक) घोषित किया और कछवाहा राजवंश का राज-काज गोविंद देव जी के नाम से ही चलाया जाने लगा। तब से आज तक, जयपुर के नागरिकों के लिए गोविंद देव जी ही इस नगरी के राजा हैं।
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1. गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड: मंदिर के मुख्य हॉल (सत्संग भवन) का नाम दुनिया की सबसे चौड़ी बिना किसी खंभे वाली कंक्रीट की सपाट छत (Widest Single Span Concrete Flat Roof) के लिए गिनीज बुक में दर्ज हो चुका है।
2. जयपुर के असली राजा: कछवाहा राजवंश के राजा स्वयं को राजा नहीं, बल्कि गोविंद देव जी का 'दीवान' (प्रधान सेवक) मानते थे। जयपुर का राजशाही झंडा (पचरंगा) जब भी फहराया जाता था, तो वह पहले गोविंद देव जी के चरणों में समर्पित होता था।
3. महल का त्याग: महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने इस विग्रह के लिए अपने स्वयं के महल 'सूरज महल' को खाली कर दिया था और खुद दूसरे महल में रहने चले गए थे।
दैनिक झांकियां और आरती का समय
झांकी का नाम गर्मियों का समय सर्दियों का समय
1. मंगला (Mangala) 04:30 AM – 05:00 AM 05:00 AM – 05:30 AM
2. धूप (Dhoop) 07:30 AM – 08:00 AM 07:30 AM – 08:00 AM
3. शृंगार (Shringar) 09:30 AM – 10:00 AM 09:00 AM – 09:30 AM
4. राजभोग (Rajbhog) 11:00 AM – 11:30 AM 10:30 AM – 11:00 AM
5. ग्वाल (Gwal) 05:45 PM – 06:15 PM 05:30 PM – 06:00 PM
6. संध्या (Sandhya) 06:30 PM – 07:15 PM 07:00 PM – 07:45 PM
7. शयन (Shayan) 08:30 PM – 09:00 PM 08:15 PM – 08:45 PM