
स्थानीय मान्यता के अनुसार:
कानपुर के इस अलौकिक धाम को लेकर स्थानीय स्तर पर और पुराणों के प्रभाव से कई बेहद रोचक और विस्मयकारी कथाएं जुड़ी हुई हैं। इनमें से सबसे प्रचलित लोककथा बारह सगी बहनों और उनके पिता के क्रोध से संबंधित है।
कहा जाता है कि प्राचीन काल में एक राजा या प्रतापी व्यक्ति थे, जिनकी बारह बेहद सुंदर और संस्कारी पुत्रियां थीं। किसी घरेलू या वैचारिक बात को लेकर इन बहनों का अपने पिता के साथ गहरा मतभेद हो गया। पिता का क्रोध इतना भयानक और अनियंत्रित था कि वे अपनी ही पुत्रियों को दंड देने और उनका अहित करने पर उतारू हो गए। पिता के इस भीषण कोप और अत्याचार से अपने सतीत्व तथा प्राणों की रक्षा करने के लिए, सभी बारह बहनें एक साथ आधी रात को चुपचाप अपने घर से भाग निकलीं। वे भागते-भागते कानपुर के इस दक्षिणी बीहड़ और घने वन क्षेत्र में आकर छिप गईं, जहाँ आज यह भव्य मंदिर स्थित है।
यहाँ आकर उन्होंने आदि शक्ति मां जगदम्बा की शरण ली और अपनी रक्षा के लिए कठोर तपस्या करने लगीं। जब उनके क्रोधी पिता ढूंढते हुए इस घने जंगल में पहुँचे और उन्होंने अपनी बेटियों पर प्रहार करने का प्रयास किया, तब उन बहनों के तपोबल और मां दुर्गा की कृपा से एक चमत्कार हुआ। सभी बारह बहनें एक साथ पत्थर की दिव्य मूर्तियों में परिवर्तित हो गईं, ताकि कोई उनके सतीत्व को छू भी न सके। अपनी बेटियों का यह रूप देखकर जब पिता को अपनी गलती का अहसास हुआ, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। लोक मान्यताओं के अनुसार, बेटियों के श्राप या इस अलौकिक घटना के आघात के कारण वह क्रोधी पिता भी वहीं पर पाषाण (पत्थर) के रूप में तब्दील हो गया।
कालांतर में, जब इस जंगल में चरवाहों और स्थानीय ग्रामीणों ने पत्थरों से अलौकिक प्रकाश निकलते देखा और कई चमत्कार महसूस किए, तो उन्होंने यहाँ पूजा-अर्चना शुरू कर दी। इन बारह बहनों को साक्षात मां शक्ति के बारह रूपों (नौ दुर्गा और अन्य देवियां) के तौर पर पूजा जाने लगा। इसी कारण इस सिद्ध पीठ का नाम "बारा देवी" या "बारह देवी" पड़ा। आज भी मान्यता है कि जो भी भक्त यहाँ आकर पूरी श्रद्धा के साथ चुनरी बांधता है, मां उसकी सूनी गोद भर देती हैं और असाध्य रोगों से मुक्ति दिलाती हैं।
उपलब्ध स्रोतों/मंदिर की जानकारी के अनुसार:
मां बारा देवी मंदिर केवल आस्था का ही केंद्र नहीं है, बल्कि इसका एक अत्यंत समृद्ध ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व भी है। मंदिर से जुड़ी उपलब्ध स्थानीय एवं धार्मिक जानकारी के अनुसार, यहाँ स्थापित मुख्य विग्रह और पाषाण प्रतिमाएं लगभग 1500 से 1700 वर्ष पुरानी पाई गई हैं। यह समय भारत के इतिहास में गुप्त साम्राज्य के समकालीन बैठता है, जो अपनी उत्कृष्ट धार्मिक वास्तुकला और मूर्तिकला के लिए जाना जाता था।
प्राचीन काल में कानपुर का यह पूरा दक्षिणी हिस्सा एक बेहद सघन वन क्षेत्र हुआ करता था, जो गंगा और पांडु नदी के मैदानी इलाकों के बीच स्थित था। उपलब्ध स्थानीय जानकारी के अनुसार, यह स्थान प्राचीन व्यापारिक मार्गों और संतों की साधना स्थली के रूप में विकसित हुआ था। जब देश में बौद्ध और हिंदू धर्म की कलाकृतियों का समागम हो रहा था, उसी काल में इस शक्तिपीठ की महत्ता पूरे आर्यावर्त (उत्तर भारत) में फैल चुकी थी।
इस मंदिर की ऐतिहासिक दृढ़ता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि मध्यकाल में जब भारत के कई हिस्सों में विदेशी आक्रांताओं द्वारा प्राचीन मंदिरों और मूर्तियों को खंडित किया जा रहा था, तब भी यह मंदिर अपने घने जंगलों के बीच छिपे होने और स्थानीय लोगों के कड़े प्रतिरोध के कारण पूरी तरह सुरक्षित रहा। स्थानीय जनश्रुतियों के अनुसार, जब भी किसी बाहरी सेना ने इस परिसर की तरफ बढ़ने की कोशिश की, तो वे यहाँ के प्राकृतिक और चमत्कारिक भटकावों के कारण रास्ता भटक गए।
ब्रिटिश काल के दौरान, जब कानपुर एक प्रमुख औद्योगिक और सैन्य छावनी के रूप में तेजी से विकसित हो रहा था, तब इस मंदिर ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में भी एक बेहद गुप्त और महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। घने पेड़ों और एकांत भौगोलिक स्थिति के कारण, सन् 1857 की क्रांति और उसके बाद के स्वतंत्रता आंदोलनों के दौरान क्रांतिकारी और स्वतंत्रता सेनानी यहाँ भेष बदलकर शरण लेते थे। मंदिर के तत्कालीन पुजारियों और स्थानीय निवासियों ने अंग्रेजी सेना की नजरों से बचाकर देशभक्तों को रसद और छिपने की जगह उपलब्ध कराई थी।
आजादी के बाद, जैसे-जैसे कानपुर शहर का शहरीकरण हुआ और आबादी बढ़ी, यह जंगल एक घने रिहायशी इलाके में बदल गया। लेकिन मंदिर के प्रति लोगों की अटूट ऐतिहासिक श्रद्धा वैसी ही बनी रही। आज यह मंदिर आधुनिक रूप ले चुका है, लेकिन इसके गर्भगृह की दीवारें और वहां की ऊर्जा भक्तों को सीधे भारत के उस गौरवशाली प्राचीन काल से जोड़ती हैं जहाँ इतिहास और अध्यात्म का अद्भुत मिलन होता है।
Bara Devi Rd 103a، 208014 Kanpur، India
Monday
6:00 am - 9:00 pm
Tuesday
6:00 am - 9:00 pm
Wednesday
6:00 am - 9:00 pm
Thursday
6:00 am - 9:00 pm
Friday
6:00 am - 9:00 pm
Saturday
6:00 am - 9:00 pm
Sunday
6:00 am - 9:00 pm
September 28, 2026 3:59 am local time
1. गर्भगृह के अंदर फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी पूरी तरह से वर्जित है।
2. श्रद्धालुओं को पारंपरिक और शालीन पोशाक पहनकर आने की सलाह दी जाती है।
3. नवरात्रि में भारी भीड़ के कारण कतारबद्ध होकर शांतिपूर्वक दर्शन करें।
अगर आप भी हिंदू धार्मिक गतिविधियों में रुचि रखते हैं और सोशल मीडिया में एक्टिव रहते हैं, साथ ही एक्स्ट्रा इनकम के विकल्प खोज रहे हैं तो "लाइव आरती लिस्टिंग प्रोग्राम" से जुड़ सकते हैं। livearti.com में आप अपने स्थानीय मंदिर, आचार्य/पंडित जी, स्थानीय धार्मिक कार्यक्रम, धार्मिक यात्रा, ऐसे व्यवसाय जो धार्मिक विधियों में इस्तेमाल होने वाले उत्पाद बेचते हैं या सेवा देते हैं, उनकी लिस्ट बना सकते हैं और अपने एफिलिएट लिंक लगा सकते हैं जिसका 100% कमीशन आपके अकाउंट में मिल सकता है, इसके अलावा “लिस्टिंग पार्टनर” बन सकते हैं ऐसे यूजर्स के साथ लिस्टिंग शेयर कर सकते हैं जो तकनीकी ज्ञान न होने की वजह से लिस्टिंग नहीं कर सकते लेकिन सोशल मीडिया पर एक्टिव रहते हैं उनके साथ शेयर्ड लिस्टिंग विद शेयर्ड एफिलिएट लिंक्स बना सकते हैं और ज्यादा से ज्यादा रीच बना सकते हैं जो आपकी एफिलिएट इनकम को 10X कर सकता है
1. मां बारा देवी मंदिर के कारण ही दक्षिण कानपुर के एक बहुत बड़े हिस्से का नाम 'बर्रा' पड़ा है, जिसे बर्रा 1 से लेकर बर्रा 9, बर्रा वर्ल्ड बैंक, बर्रासिरोही और बिंगावां के नाम से जाना जाता है।
2. यहाँ सदियों पुरानी 'चुनरी-बंधन' की परंपरा है; मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु दोबारा आकर बंधी हुई चुनरी की गांठ खोलते हैं।
3. शारदीय और चैत्र नवरात्रि के दौरान यहाँ देवी मां को 51 किलोग्राम की विशाल जलेबी का भोग लगाने की एक अनोखी स्थानीय परंपरा है।
1. मंगला आरती व श्रृंगार झांकी: प्रातः 06:30 AM
2. भोग झांकी: दोपहर 12:00 PM
3. संध्या आरती व महाझांकी: रात्रि 07:30 AM से 08:00 PM