
स्थानीय मान्यता के अनुसार:
दिल्ली के झंडेवाला देवी मंदिर की स्थापना के पीछे एक अत्यंत चमत्कारी और गहरी आस्था से जुड़ी लोककथा प्रचलित है। यह कथा 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध की है, जब यह पूरा क्षेत्र आज की तरह कोई व्यस्त शहरी इलाका नहीं था। उस समय यहाँ दिल्ली की ऐतिहासिक अरावली पर्वत श्रृंखला की हरी-भरी पहाड़ियाँ, घने जंगल, प्राकृतिक झरने और शांत वातावरण हुआ करता था। इस शांत और रमणीय पहाड़ी क्षेत्र में चांदनी चौक के एक बेहद प्रतिष्ठित और धार्मिक प्रवृत्ति के कपड़ा व्यापारी, श्री बद्री दास (जिन्हें लोग प्यार से बद्री भगत कहते थे), अक्सर सुबह-शाम टहलने और सैर करने आया करते थे। बद्री दास माता वैष्णो देवी के परम भक्त थे और इस निर्जन पहाड़ी पर बैठकर घंटों माँ आदि शक्ति के ध्यान में लीन हो जाया करते थे।
एक दिन जब बद्री दास इसी पहाड़ी पर एक झरने के पास गहरे ध्यान में बैठे थे, तो उन्हें अचानक भूमि के भीतर किसी दिव्य शक्ति या प्राचीन मंदिर की उपस्थिति का तीव्र आभास हुआ। उसी रात, माता वैष्णो देवी ने उनके सपने में दर्शन दिए और उन्हें बताया कि जिस स्थान पर वे ध्यान करते हैं, उसी पहाड़ी के नीचे एक प्राचीन गुफा में उनकी एक अति प्राचीन मूर्ति दबी हुई है। माता ने उन्हें उस स्थान की खुदाई करने और मूर्ति को बाहर निकालकर लोक कल्याण के लिए स्थापित करने का आदेश दिया।
अगले ही दिन, बद्री दास ने माता के आदेशानुसार बताए गए स्थान पर खुदाई का कार्य प्रारंभ करवाया। कुछ समय की खुदाई के बाद ही ज़मीन के नीचे से माँ आदि शक्ति की एक अत्यंत सुंदर और अलौकिक प्रतिमा और साथ में नक्काशीदार नागों वाला एक प्राचीन शिवलिंग प्रकट हुआ। लेकिन, दुर्भाग्यवश खुदाई करते समय कुदाल की चोट से माता की मूर्ति के दोनों हाथ खंडित हो गए थे। हिंदू शास्त्रों के अनुसार खंडित मूर्ति की मुख्य गर्भगृह में पूजा वर्जित मानी जाती है, जिससे बद्री दास बहुत दुखी हुए।
तब उन्होंने एक अनूठा उपाय निकाला। उन्होंने माता की उस प्राचीन और मूल विग्रह के खंडित हाथों पर चांदी के सुंदर हाथ लगवाए और उन्हें उसी भूमिगत गुफा (जिसे आज 'माँ गुफा वाली' कहा जाता है) में ससम्मान स्थापित कर दिया। चूंकि मंदिर एक ऊंचे पहाड़ी क्षेत्र पर स्थित था और दूर-दूर से लोगों को दिखाई नहीं देता था, इसलिए बद्री दास ने मंदिर परिसर में एक बहुत बड़ा और विशाल ध्वज (झंडा) लगाया ताकि दूर से ही भक्त माँ के दरबार को पहचान सकें। इसके बाद भक्त अपनी मन्नतें पूरी होने पर यहाँ माता को झंडे चढ़ाने लगे। झंडों की इसी अधिकता और विशाल ध्वज के कारण इस मंदिर का नाम हमेशा के लिए 'झंडेवाला मंदिर' पड़ गया।
उपलब्ध स्रोतों/मंदिर की जानकारी के अनुसार:
झंडेवाला देवी मंदिर का इतिहास केवल धार्मिक मान्यताओं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका एक अत्यंत समृद्ध ऐतिहासिक और सामाजिक महत्व भी है, जो दिल्ली के क्रमिक विकास को दर्शाता है। ऐतिहासिक दस्तावेजों और मान्यताओं के अनुसार, इस मंदिर का इतिहास लगभग 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध (लगभग 1780-1790 ईस्वी) से प्रारंभ होता है। मुगल साम्राज्य के अंतिम काल और ब्रिटिश शासन के शुरुआती दौर में यह क्षेत्र दिल्ली शहर की बाहरी सीमा पर स्थित 'राम बाग' और अरावली पहाड़ियों का हिस्सा था।
जब व्यापारी बद्री दास ने इस गुप्त सिद्धपीठ की खोज की और यहाँ छोटा सा मंदिर बनवाया, तो यह धीरे-धीरे आसपास के गांवों और पुरानी दिल्ली के निवासियों के लिए आस्था का एक बड़ा केंद्र बन गया। ब्रिटिश काल के दौरान, इस मंदिर परिसर में एक बेहद प्रसिद्ध वार्षिक मेला आयोजित किया जाता था जिसे 'पावन परीक्षा मेला' कहा जाता था। इस मेले में न केवल दिल्ली बल्कि पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के सुदूर क्षेत्रों से भी व्यापारी और श्रद्धालु आते थे। हालाँकि, वर्ष 1947 में भारत के विभाजन (Partition) के बाद बदली हुई परिस्थितियों और शहरीकरण के कारण यह ऐतिहासिक मेला समाप्त हो गया, लेकिन भक्तों की आस्था और मंदिर का विस्तार निरंतर बढ़ता रहा।
एक ऐतिहासिक संदर्भ यह भी मिलता है कि मुग़ल सम्राट शाहजहाँ के शासनकाल के दौरान भी इस पहाड़ी क्षेत्र के आसपास के मार्गों पर सुरक्षा और धार्मिक पहचान के लिए बड़े-बड़े झंडे लगाए जाते थे, जिससे इस क्षेत्र का जुड़ाव 'झंडे' शब्द से पुराना माना जाता है। स्वतंत्रता के बाद, जैसे-जैसे पुरानी दिल्ली और नई दिल्ली का विकास हुआ, यह पहाड़ी क्षेत्र पूरी तरह से एक आधुनिक शहरी क्षेत्र में तब्दील हो गया, जिसे आज हम करोल बाग और झंडेवालान एक्सटेंशन के नाम से जानते हैं।
इस मंदिर की सबसे बड़ी ऐतिहासिक और सामाजिक विशेषता यह रही है कि यह आदि काल से ही पूरी तरह समतावादी रहा है। पुराने समय में जहाँ कई बड़े मंदिरों में जाति, वर्ग या सामाजिक स्थिति के आधार पर भेदभाव की शिकायतें मिलती थीं, वहीं झंडेवाला मंदिर के कपाट पहले दिन से ही समाज के हर तबके, अमीर-गरीब और हर जाति के व्यक्ति के लिए समान रूप से खुले रहे।
मंदिर के सुचारू संचालन और इसकी ऐतिहासिक धरोहर को अक्षुण्ण रखने के लिए, बद्री दास के वंशजों और प्रबुद्ध नागरिकों ने मिलकर 'बद्री भगत झंडेवाला मंदिर सोसाइटी' नाम से एक गैर-लाभकारी ट्रस्ट का गठन किया। आज यह सोसाइटी न केवल मंदिर का प्रबंधन देखती है, बल्कि बड़े पैमाने पर सामाजिक कार्य, मुफ्त डिस्पेंसरी, शिक्षा सहायता और आपदा राहत कार्य भी संचालित करती है। आज यह प्राचीन सिद्धपीठ दिल्ली सरकार के आधिकारिक पर्यटन और दर्शनीय स्थलों की सूची में प्रमुखता से शामिल है, जो इसके ऐतिहासिक गौरव की गवाही देता है।
Mukherjee Nagar Lane 324، 110005 New Delhi، India
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September 28, 2026 4:00 am local time
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दो स्तरों का रहस्य: क्या आप जानते हैं कि यह मंदिर दो मंजिलों (Double-storey) में विभाजित है? ज़मीन के नीचे बनी असली और ठंडी वातानुकूलित प्राकृतिक गुफा में माता की वही स्वयंभू प्राचीन मूर्ति स्थापित है जो खुदाई में मिली थी, जबकि ऊपरी मंजिल पर भक्तों की भारी भीड़ की सुविधा के लिए माता की एक बड़ी और हूबहू सुंदर प्रतिकृति स्थापित की गई है।
कोई बाहरी सामग्री नहीं: क्या आप जानते हैं कि झंडेवाला मंदिर में आपको बाहर से फूल, माला, अगरबत्ती, धूप या चुनरी खरीदकर ले जाने की आवश्यकता नहीं होती? मंदिर प्रबंधन सुरक्षा और स्वच्छता के लिए प्रवेश द्वार पर ही ये सामग्रियां जमा करवा लेता है और मंदिर के भीतर से ही सभी भक्तों को पूरी तरह शुद्ध और मुफ्त प्रसाद वितरित किया जाता है।
मुगल काल से संबंध: क्या आप जानते हैं कि इस मंदिर को इसका 'झंडेवाला' नाम मुग़ल काल (विशेषकर शाहजहाँ के समय) के दौरान भक्तों द्वारा माता की मन्नत पूरी होने पर सोने, चांदी और कपड़ों के अनगिनत झंडे (ध्वज) अर्पित करने की अनोखी परंपरा के कारण मिला था।
अखंड ज्योति और नक्षत्र गुफा: मंदिर के भीतर एक विशाल हवन कुंड है जहाँ एक दिव्य अखंड ज्योति लगातार प्रज्वलित रहती है। इसके अलावा नीचे की गुफा का आंतरिक हिस्सा आधुनिक समय में इस तरह से डिज़ाइन किया गया है कि वहाँ प्रवेश करते ही आपको ब्रह्मांड या मिल्की वे गैलेक्सी (Milky Way Galaxy) जैसी अद्भुत खगोलीय और आध्यात्मिक ऊर्जा की अनुभूति होती है।
खुलने और बंद होने का समय (Timings)
सामान्य दिन:
सुबह 05:00 बजे से दोपहर 12:00 बजे तक
तथा शाम 04:00 बजे से रात्रि 10:00 बजे तक
विशेष दिन (मंगलवार, रविवार और अष्टमी): दोपहर में भी खुला रहता है
नवरात्रि के दौरान: सुबह 04:00 बजे से लगातार रात 12:00 बजे तक
दैनिक झांकियां और आरती (Darshan Windows)
1. मंगल आरती: सुबह 05:30 बजे (सूखे मेवे का भोग)
2. शृंगार आरती: सुबह 09:30 बजे (चीले, दूध, चने और नारियल का भोग)
3. भोग आरती: दोपहर 12:00 बजे (चावल, रोटी और दाल का भोग)
4. सांध्य आरती: शाम 07:30 बजे (शीतकाल) / 08:00 बजे (ग्रीष्मकाल)
5. शयन आरती: रात्रि 10:00 बजे (दूध का भोग)